Thursday, June 13, 2013

मौसम आयेंगें.... मौसम जायेंगें......!!!


आज का मौसम देख कर परदेस में अपने देस की बहुत
याद आ रही है,देस में गर्मी से आप झुलस रहें है .और यहाँ
जनवरी का मौसम बना हुआ है ,और मैं अपने कानो पर
हेडफोन लगाये हुसैन बन्धुओं से ..मौसम आयेंगे ,मौसम
जायेंगें ...हम तुम को न भूल पायेंगें.....सुन रहा हूँ और
अपने देश के मौसम को याद करके उसका मज़ा ले रहा हूँ ....
वहां के मौसम की यादों के साथ अपने आप को बहने से
रोक नही पा रहा हूँ ,,,,,
वो सर्दी के मौसम में सुबह की धूप का मज़ा,
वो सर्दी की लम्बी रातों में लिहाफ़ में सोने का मज़ा और फिर चुस्कियां
ले ले कर गर्म -गर्म चाय पीने का मज़ा .....
और अब गर्मी की झुलसती धूप की दोपहरी का सूनापन ,
धूल भरी आँधियों के शोर में शाम की ठंडी-ठंडी हवाओं का इंतज़ार ...
साथ में ठन्डे-ठन्डे तरह-तरह के पेय को पीने की ललक ..वाह!
उसका मज़ा भी अपना ही है ......गर्मी को दूर करने के तरह-तरह
 के उपाय वाह!.....
और फिर सावन की ठंडी-ठंडी फुहारों का इंतज़ार ....सावन के गीत ,
सावन के झूले ,सावन की बारिश... आँख बंद करके छीटों से चेहरे
को भिगोना और अपने चाहने वालों की यादों में खो जाने ...का मज़ा
ही अपने देस में है ....
शायद इसी लिए परदेस में देस की बहुत याद आती है .....
वैसे भी तो हम हिन्दुस्तानी है ...भावुक होना हमारी फितरत
और दूर जा कर अपनों को याद करना ,कद्र करना ही हमारी
रगों में समाया है ....
पास रहकर हम हो जाते है लापरवाह
दूर होते ही ,पुकारते है आ तू पास आ .....
चलिए ..छोडिये ..लिखना मुझे आता नही और मैं भावुकता
में बहता जा रहा हूँ ....
बाकि की कसर मैं अपने हुसैन बन्धुओं की ये खुबसूरत
मौसमों के ऊपर गाई ग़ज़ल आप सब को सुनवा कर अपने
ज़ज्बातों को महसूस कराने की कोशिश करता हूँ....
उम्मीद करता हूँ ,,
आप का प्यार मिला तो कामयाब हो जाऊंगा |
तो सुनिए .........













 
 खुश और स्वस्थ रहें.....
 टोरंटो (कनाडा)

Monday, June 03, 2013

मैंने उसको....सताया नही !!!

करता था मैं उनसे प्यार 
और आज भी करता हूँ, 
पहले वो मुझ पे मरते थे 
आज मैं उनपे मरता हूँ ||
----अशोक"अकेला"
मैंने उसको....सताया नही !!! 

कलम हाथ में लिए बैठा हूँ
 उसने कुछ सुझाया ही नही

 बोला दिल कुछ,मुझसे ऐसे
 किसी ने मुझे,दुखाया ही नही

 क्या लिखाऊं,क्या सुझाऊ तुझे
 आज किसी ने तड़फ़ाया नही

 चारों तरफ है सुहाना लगे
 आज मैं भी घबराया नही

 उसने भी कह दी अपनी बात
 और मैं भी आज शरमाया नही

 कुछ ऐसा भी कहा कान में
 मेरी कुछ समझ आया नही

 मैंने भी छोड़ दिया उसको'अकेला'
 आज मैंने भी उसको सताया नही ....
 ---अशोक 'अकेला'

आप के लिए ..Toronto Canada से ...
स्वस्थ रहें!

Thursday, May 23, 2013

मुझे तो बीती यादों से दिल बहलाना है .... !!!


आजकल अपने वतन से दूर ....और अपनी छोटी बेटी के 
बहुत पास टोरंटो (केनाडा) में श्रीमती जी के साथ ,और अपनी 
दोनों नातिन के संग समय बहुत अच्छा कट रहा है ........!!!
पर फिर भी बाकी समय तो ........|


मुझे तो बीती यादों से दिल बहलाना है .... !!! 

खुशीयों से नही अदावत मेरी
 बस ग़मों से रिश्ता पुराना है

 आज मुस्कराहट है मेरे चेहरे  पर
 कि आज फिर मौसम सुहाना है

 उदास हो जाता हूँ ,जब कभी
 याद आता वो वक्त पुराना है

 जब भी याद आ जाते हैं वो
 याद आता वो गुज़रा जमाना है

 अब कुछ भी रहा मेरे पास नही
 बस बीती यादों का वो खज़ाना है

 हिम्मत नही किसी से कुछ कहने की
 देख-सुन कर अब सिर्फ मुस्कराना है

 भले नश्तर चुबोयें वो मेरे दिल को आज
 मुझे तो बीती यादों से दिल बहलाना है ....
आप सब बहुत खुश और स्वस्थ रहें |
शुभकामनायें!
अशोक सलूजा 


Monday, May 13, 2013

आ...एक बार तो... मनाने के लिए आ!!!

शिकायतों के सिवा जब 
कुछ भी न हो पास तेरे, 
रख बन्द जुबान अपनी
लगा ले बस चुप्पी के डेरे ||
---अशोक 'अकेला'

आ...एक बार तो... मनाने  के लिए आ!!!

आजकल रोज़ दिल, दुखा जाता है वो
 याद रहता है मुझे, भूल जाता है वो

 हे भगवन ,ये कैसा मुकद्दर पाया है मैंने
 हँसाने की कोशिश में, रुला जाता है वो

 बहुत मनाया, समझाया भी उसको मैंने
 हर बात को मेरी,हवा में उड़ा जाता है वो

 मजबूर हूँ क्या करूँ, कमज़ोरी है वो मेरी
 दिल को फिर, किसी बात पर भा जाता है वो

 करता हूँ जब भी मैं, दूर रहने की कोशिश
 ज़हन पर आ कर, फिर छा जाता है वो

 मायूस हो कर बैठ जाता हूँ, मैं जब भी कभी
 अच्छे मूड में हो, तो रहम खा जाता है वो

 'अकेला' रोज़ सोचता हूँ, न अब उससे आँख मिलाऊंगा
 ढ़ुंढ़ती हैं आँखें उसको, जब भी याद आ जाता है वो
चित्र ..गूगल साभार !
अशोक'अकेला'







Friday, May 03, 2013

जब भी रोना हो !!! चिरागों को बुझा कर रोना...


मुहँ की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के शहरों में
ख़ामोशी पहचाने कौन....
---निदा फ़ाज़ली

यादें ......
अपनी यादों की पोटली से निकाल कर लाया हूँ ....
आप के लिए एक गज़ल...
जो अपने खुबसूरत अल्फाज़ों से सजाई है,
ज़नाब मीर ताक़ी मीर ने और गाया है अपनी दर्द भरी
मीठी आवाज़ में ज़नाब मरहूम परवेज़ मेहदी साहब ने ......
इस गज़ल में ख़ामोशी के आवाज़े हैं ....
दिल के दर्द का सुकून है ...
आँखों में अश्को की छुपी बरसात है ...
दिल के किसी कोने में छुपी यादों की बारात है ...
ग़म का बिछौना है ...
ग़र फिर भी सुकून से सोना है ....
तो ज़रूरी...चैन से रोना है ...
तो बस!!! उस रोने की ही बात है !!!

अपने साये से भी ,अश्को को छुपा कर रोना
जब भी रोना हो ,चिरागों को बुझा कर रोना

हाथ भी जाते  हुए , वो तो मिला कर न गया
मैंने चाह जिसे ,सीने से लगा कर रोना
जब भी रोना हो ,चिरागों को बुझा कर रोना...

तेरे दीवाने का ,क्या हाल किया है ग़म ने
मुस्कराते हुए लोगो में भी जा कर रोना
जब भी रोना हो ,चिरागों को बुझा कर रोना...

लोग पढ़ लेते हैं ,चेहरे पे लिखी तहरीरे
कितना दुश्वार है लोगो से छुपा कर रोना
जब भी रोना हो ,चिरागों को बुझा कर रोना ...

अपने साये से भी ,अश्को को छुपा कर रोना
जब भी रोना हो ,चिरागों को बुझा कर रोना |
|



उम्मीद करता हूँ कि मेरी पसंद .... 
आप को भी पसंद आई होगी !!!
 खुश रहें,स्वस्थ रहें !

Tuesday, April 23, 2013

टूटे रिश्तों को...जोड़ लेता हूँ !!!


जिन्दगी के टूटे सिरों को 
मैं फिर से जोड़ लेता हूँ, 
ग़मों के बिछोने पर 
ख़ुशी की चादर ओड़ लेता हूँ... 
---अशोक 'अकेला'
टूटे रिश्तों को...जोड़ लेता हूँ !!!

 अपने हौंसलो से, होड़ लेता हू
 मिले महोब्बत, निचोड़ लेता हूँ

 दुनियां के झूठे, रीति-रिवाजो से
 मुस्करा , मुहँ को मोड़ लेता हूँ

 अपने ग़मों के, बिछोने पर
 ख़ुशी की चादर, ओड़ लेता हूँ

 उलझी जिन्दगी, की डोर को
 हाथ से ख़ुद, तोड़ लेता हूँ

 अब तो आदत, सी हो गई है
 टूटे रिश्तों को, जोड़ लेता हूँ

 ज़माने संग, चल सकता नही अब
 बस 'अकेला' सपनों में, दोड़ लेता हूँ...


अशोक'अकेला'


Tuesday, April 09, 2013

सब कुछ सिखाती है .....ये जिन्दगी !!!

सब कुछ सिखाती है !!!  ये जिन्दगी .....


पग-पग सिखाती है कुछ नये ढंग, ये जिन्दगी
 पल-पल दिखाती हैं कुछ नये रंग, ये जिन्दगी

 किसको कहूँ पराया, किसे कहूँ मैं अपना
 हर घड़ी मुझको बताती है, ये जिन्दगी

 टेड़े-मेढे, ऊँचे-नीचे रास्तों पर है मंजिल
 रास्तों पर चलना सिखाती है, ये जिन्दगी

 जो कल गले मिले आज पहचानते नही
 ऐसे-ऐसे लोगों से मिलाती है, ये जिन्दगी

 सीना फुला के चलें ,सर तान के उम्र भर
 ऐसे-वैसे लोगों का सर झुकाती है, ये जिन्दगी

 मैं....मैं हूँ, पड़ जाती है गलतफ़हमी जिसे
 फिर उसको बड़ा सताती है, ये जिन्दगी

 जो प्यार से सब को लगाये गले अपना बनाये
 "अकेला"उसी को प्यार से सजाती  है, ये जिन्दगी....

अशोक'अकेला'




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