Thursday, August 21, 2014

क्या आपने....? महसूस किया..!!!

बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ ...शायद फिर बहुत दिन 
बाद लिख पाँऊ....जहाँ जा रहा हूँ ,वहाँ इन्टरनेट की 
प्रोब्लम रहती है ....स्वस्थ रहें !

ब्लॉग पर आजकल पतझड़ का मौसम चल रहा है 
पर उम्मीद अभी बाकी है ????

हर पतझड़ के बाद हरियाली आती है 
लगे दिल पे चोट ,सुकूने ख्वाबो-ख्याली आती है ....,
--अशोक'अकेला'

यह मेरे दिल से निकले 
मेरे अहसास हैं ..
अपने चारों तरफ़ देखे
मेरे तजुर्बात है.... 
जो,जैसा मैं महसूस करता हूँ ...
वो,वैसा ही साधारण सा लिख देता हूँ.......





















क्या आपने....? महसूस किया..!!!

जब से बच्चे बड़े हुए , बच्चे समझदार हो गये  
हम बड़े थे ,छोटे हो गये, लो गुनेहगार हो गये,
 
जिन्हें पाला-पोसा था , हमने अपने हाथों से 
वो तो आज हमारे ही, पालन हार हो गये,
  
जो कभी लाडले और आज्ञाकारी थे हमारे,
आज उनके ही हम तो, ताबेदार हो गये,
 
पढ़े-लिखों के आगे हमारे पुराने विचारों का क्या  
न वो समझ पायें हमें, उनके आगे लाचार हो गये,
 
अब तो चलती है उनकी, हम तो सिर्फ़ सुनते हैं
बच्चों के बच्चे भी, हमसे ज्यादा समझदार हो गये ,
   
वो भी सिखाने लगे हैं बहुत कुछ अब हमको 
देखते हैं, उनके अपने ही शिष्टाचार हो गये
 
आज हो गये हम पुराने, बातें भी दकियानूसी  
हम पुराने अखबार के बासी समाचार हो गये,
 
लद गया रामायण, महाभारत और गीता का ज़माना 
आज के बच्चे धूम ३ और कृष के अवतार हो गये,
 
था वक्त हमारे पास, रिश्तों और बजुर्गों के लिए 
आज बच्चों के बच्चे ही, उनके रिश्तेदार हो गये,
.
न देखे सगे-सम्बन्धी ,न दोस्त और न रिश्तेदार 
देखें बंगला गाड़ी, बटुआ वैसे ही व्यवहार हो गये,
    
न रही दिल में इज्ज़त ,न रहा मान-सम्मान  
जैसे हो हेसियत ,वैसे ही अब व्योपार हो गये, 

थे जवां, था काम, होता था नाम, सुबह और शाम
जवानी ढली , बुढ़ापे ने घर बिठाया, बेकार हो गये

जैसी करनी .वैसी भरनी, था क्या हमारा भी ज़माना 
'अकेले' रह गये हम तो आज,  फ़सले-बहार हो गये ... 
अशोक'अकेला'



Monday, June 23, 2014

क़ुदरत की बक्शी...मुस्कुराती यादें !!!

आज लगभग तीन महीने होने को हैं ...जब से एक भी 
पोस्ट नही लिख पाया ...कारण,पिछले काफ़ी दिनों से 
मेरा डेरा धनोल्टी (मसूरी) में था और वहाँ बी.एस.एन एल
इन्टरनेट की अच्छी सुविधा न होने के कारण न चाहते हुए 
भी ऐसा हो गया .. न कुछ लिख सका .न किसी ब्लॉग पर 
आप से रु-ब-रु हो सका ...इसके लिए आप सबसे माफ़ी का 
तलबगार हूँ ..आप सब खुश रहें .स्वस्थ रहें |
वहाँ रहकर जो एहसास मुझे हुआ,जो मेरे दिल ने महसूस 
किया उसे अपने सीधे-सादे लफ़्ज़ों में आप के सामने रख 
रहा हूँ ....
आभार | 
आज भी वो इक सपने सी बात लगती है 
हुई मुद्दतों पहले, कल की बात लगती है....
--अशोक"अकेला" 
करी थी जब हमने बहुत खुल के बातें ,
आज वो भी इक छोटी मुलाकात लगती है 

देखने की चाहत है उस सपने को अब भी  
आज बरसों की लम्बी सी इंतज़ार लगती है 

बंद आँखों से महसूस होता है आज मुझको 
वो मुझे देख मंद-मंद मुस्कुराती सी लगती है 

बदली से निकले बेकरार चाँद जिस तरह 
वो काले गेसुओं से झांकती सी लगती है 

फिर चली दिल में ठंडी झूमती सी हवाएं 
खुशबु झोंकों से उठती बयार सी लगती है

चलो कुछ देर को, दिल को करार तो आया  
जानता हूँ, झूठी नकली सी बहार लगती है 

आज इन फ़िज़ाओं के साथ मिल के लगे है ऐसा 
मैं कभी 'अकेला' न था, कुदरत मेरे साथ चलती है.... 
अशोक'अकेला'


Thursday, March 27, 2014

सिर्फ एक दुआ ...जब तक आप के बीच रहूँ !!!

आज मैं अपने जीवन के, ७२ बसंत पुरे कर चूका हूँ, 
और ७३ वें बसंत में कदम रख रहा हूँ ...
सफ़र कहाँ तक है ,कब तक है ,ये भविष्य के गर्भ में छिपा है ...
आप से सिर्फ एक बात का इच्छुक हूँ, 
आप के स्नेह का ,आप की दुआ का ,
सिर्फ एक दुआ ...जब तक आप के बीच रहूँ !!! 
स्वस्थ रहूँ ..दुआ कीजिये ,दिल से कीजिये |
सब कुछ पाया मैंने आपसे ..देने को सिर्फ 
शुभकामनायें और आशीर्वाद है ....
खुश रहें,स्वस्थ रहें !

क्या से क्या नज़र आता हूँ मैं 
शीशा भी आजकल पूछता है मुझसे ...
--अशोक'अकेला'
अब ....और ...

तब ....
चलो दी फिर दिल ने तसल्ली 
झूठी ही सही ,करार तो आया.... 

दी दिल ने, दिल को तसल्ली 
और दिल को, करार आ गया 

यूँ ही पहुंचे थे, दिल को थामे 
और उनका, दरो-दिवार आ गया 

निकला तो था, वीरानियों में मैं 
और खुशियों का, बाज़ार आ गया 

रह गयी पीछे, धूल भरी आंधियां 
और मौसम, ख़ुशगवार आ गया 

मायूस हो के, उड़ गये परिंदे शाख से 
और अब उनपे, शोख़ी-ख़ुमार आ गया 

छाई अब खुशियाँ ही खुशियाँ, चारो तरफ 
हर तरफ से ये अब, समाचार आ गया 

जो न देखते थे, कभी पलट के मुझको
आज उनको भी, मुझ पे प्यार आ गया ....

----अशोक'अकेला'


Sunday, February 23, 2014

अब मर्ज़ी नही हमारी ... है अब.. वक्त की बारी !!!

अब मर्ज़ी नही हमारी ...
      है अब.. वक्त की बारी !!!
सुना करते थे, जीवन में
 इक दौर ऐसा, भी आता है
 अकेले, पड़े रहोगे कोने में
 झाँकने न कोई आता है...

अब इंतज़ार रहता है हरदम
 घर में किसी के आने का ,
 भूले-भटके ही सही...
 किसी के द्वारा हाल पूछे जाने का..

 जब दिल में दर्द होता है
 तो इक टीस सी उठती है
 चीख तो निकलती नही
 बस सांस सी घुटती है...

 आज सोच मेरी आँखों में
 आ जाती है नमी,
 किसी को अब महसूस
 होती नही मेरी कमी...

 माँ कहतें हैं जिसे काश!
 कि वो मेरी भी होती, 
 मैं भी गिरता आज बन
 किसी आँख का मोती...

 न रहे अब वो यार
 न किसी से यारी है
 कुछ को खा गया वक्त
 कुछ को खाने की तैयारी है...

 दिल के दर्द को.... जाने कौन 
 जिसने सहा.... बाकि सब मौन!!!

अशोक'अकेला'





Tuesday, January 21, 2014

यहाँ हर शख्स ......उदास सा क्यों है ???

कैसा है मन, कभी-कभी  
ये यूँ भी उदास होता है...
सब कुछ है,पास फिर भी 
खालीपन का अहसास होता है.... 
---अशोक'अकेला'

यहाँ हर शख्स ......उदास सा क्यों है ???
बलाएँ अपनों की लिए जा रहा है 
 भ्रम के दायरे में जिए जा रहा है

 खा रहा है अपने ही खून से दगा
 और खून के घूंट पिए जा रहा है

 रह-रह के करता है यकीं उसी पर
 जो ठोकर पे ठोकर दिए जा रहा है

 बहुत समझाया दिल को मैंने अपने
 दिल झूठी तसल्ली दिए जा रहा है

 ग़र गुनाह करे,आज की औलाद
 कसूर संस्कारों को दिए जा रहा है

जननी भी साथ देती है औलाद का 
जन्मदाता ग़म को पिए जा रहा है 

 है भारतवासियों का ही दस्तूर यह
फिर भी उम्मीद पे जिए जा रहा है...


अशोक'अकेला'



Monday, December 23, 2013

काँटों भरी फूलों से सजी .....दुनियां है ये !!!


काँटों भरी फूलों से सजी .....दुनियां है ये !!!

क्यों बैठा उदास ,यूँ हैरान सा क्यों है
 कुछ तो बता , यूँ परेशान सा क्यों है...

 गुलों से गुलज़ार था ये चमन तेरा
 लगता ये आज वीरान सा क्यों है...

 हमेशा चहल-पहल थी इस डगर पर
 आज ये रास्ता सुनसान सा क्यों है...

 क्या न मिला, तुझको इस जहाँ से
 बचा आज कोई अरमान सा क्यों है...

 चल उठ फिर से बना तकदीर अपनी
 नज़ारा आज यहाँ शमशान सा क्यों है...

 आज फिर लगा दे सुखों का मेला
यहाँ 'अकेला' अब खाली पड़ा मैदान सा क्यों है .....
अशोक'अकेला'

Wednesday, December 11, 2013

वो यादें ......बचपन की !!! ये बातें .....बाद पचपन की !!!

वो यादें ......बचपन की !!! 
ये बातें .....बाद पचपन की !!!
कल और आज
वो शोखियाँ ,
वो मस्तियाँ
वो शरारतें ,
वो खुराफ्तें  
वो यादें बचपन की ...

ये उदासियाँ ,
ये वीरानियाँ
ये बेईमानियाँ, 
ये शामते 
ये बातें ,बाद पचपन की ...

न खौफ़ था ,
न फ़िक्र थी
न थी जिम्मेवारियां 
थी बस बचपन की किलकारियाँ
वो यादें बचपन की ...

अब बेबसी है ,
घुटन है ,
हैं दुश्वारियाँ
झेलने को बची है ,
अब बस बीमारियाँ 
ये बातें ,बाद पचपन की...

वो बचपन का दौर था 
थोड़ा लड़े.थोड़ा भिड़े 
निकाला गालीयों पे ज़ोर था...

आया जवानी का दौर था 
तूने देखा ,मैंने देखा 
थोड़ा मुस्कराये,गले मिले
बस हसीं-ठठ्ठे का ज़ोर था ... 

न जाने कब आया
बुढ़ापा मेरी  ओर था
शोख बचपन भागा
मस्त जवानी खोई 
देख बुढ़ापा आँखे रोई  ...

बचपन ने लूटी शरारतें 
जवानी ने लूटी मस्तियाँ 
बुढ़ापे ने मिटा दी हस्तियाँ 
बस बची हैं उजड़ी बस्तियां ..... 

-----अशोक'अकेला'

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